कुंडलीनी मंत्र साधना

KUNDALINI MANTRA मुलाधार चक्र GULERIA

Basic Kundalini

कुंडलीनी

कुंडलीनी Kundalini Mantra मुलाघार मंत्र साधना -मूलाधार शब्द में मूल का अर्थ है जड़ , ओर आधार का अर्थ है जहाँ से शुरुआत की जाऐ , शब्दों के मिश्रण से बना मुलाधार , मनुष्य शरीर का निर्माण उसकी माँ के गर्भ में ब्रम्हा स्थान मनीपुर चक्र मे जहाँ बच्चे की नाल माँ से जुड़ी होती है। शुरुआत में मनुष्य शरीर का निर्माण शिव शक्ति द्वारा उर्जा रूप शरीर में होता है. और पिछले कर्मो के अनुरूप भौतिक शरीर की रचना होती है. तो उसकी जड़ें वहीँ शिव शक्ति की ऊर्जा से जुड़ी होती है और उसका आधार भी वही होता है। अगर कर्मो के फलस्वरूप आपके उर्जा रूप शरीर में कोई विकार या गड़बड़ी हो जाती है तो उसका सीधा असर शरीर पर पड़ता है। ओर शिव द्वारा उत्पन्न ऊर्जा मे व्यवधान उत्पन्न होने लगता है , इसी व्यवधान को हटाने के लिए मंत्र साधना द्वारा कुंडलीनी जागरण किया जाता है। शिव शक्ति शिव धर्म का पालन करने वाले को शिव जी हमेशा भक्तों की रक्षा एवं विकास करते हैं। शिव शक्ति द्वारा उत्पन्न ऊर्जा से आत्मा का जन्म ओर ब्राह्म द्वारा शरीर का निर्माण होता है। विशनु द्वारा पालन पोषण होता है। शिव धर्म

मुलाधार चक्र

मूलाधार चक्र के सांकेतिक चित्र में चार पंखुडिय़ों वाला एक कमल है। ये चारों मन के चार कार्यों : पहला स्थान शिव धर्म प्राण ,स्नायु तंत्र , है दुसरा शक्ति चामुंडा ,तनाव मुक्ति , तीसरा सुर्य काम शक्ति है। एवं चौथा सौंदर्य वाणी ,मोक्ष इस चक्र के अंदर त्रिकोण में कुछ ओर शक्तियां समाहित है , जिस का ग्यान आगे शिव धर्म कुंडलीनी जागरण साधना करने वाले को दिया ही जाता है , सभी इस चक्र में उत्पन्न होते हैं। मनुष्य शरीर के सात चक्रों में से मूलाधार चक्र प्रथम चक्र है. इसका स्थान मनुष्य रीढ़ हड्डी के नीचे गुदा और लिंग के मध्य होता है. इस चक्र में 4 पंखुडियां होती है इसके सबसे नीचे स्थित होने के कारण ही इसे आधार चक्र कहा जाता है. क्योकि हर बहुत ही कम व्यक्ति अपने चक्रों को जाग्रत कर पाता है जिसके कारण उनकी चेतना मूलाधार चक्र में ही फंसी रहती है और उनके मरने के समय में भी उनकी चेतना वहीँ रहती है. अगर आप भोग, विलास, संभोग, आलस मे लिप्त मानव ,जन्म मरन नरक एवं अधर्म में फंसा रहता है। आपकी चेतना और उर्जा मूलाधार चक्र के आसपास ही एकत्र हो जाती है. यही से स्वर्ग ओर यही से नरक का द्वार खुलता हैं। इसको जाग्रत करने के लिए , इनसे सब दुष्ट अधर्म से बाहर निकल कर शिव धर्म का रास्ता पकड़ना पड़ता है।

मुलाधार चक्र साधना

बिना मूलाधार चक्र ना तो व्यक्ति के उर्जा रूप शरीर का निर्माण होता है और ना ही उसके भौतिक शरीर का तो यहीं से अंदाजा लगाया जा सकता है कि मूलाधार चक्र व्यक्ति के जीवन में कितना महत्व रखता है. जब व्यक्ति अपनी कुंडलिनी शक्ति को जाग्रत करना चाहता है तो उसकी शुरुआत भी उसे मूलाधार चक्र से ही करनी पड़ती है. · मूलाधार चक्र जागरण प्रभाव : जब किसी व्यक्ति का मूलाधार चक्र जाग्रत हो जाता है तो उसके स्वभाव में परिवर्तन को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है. जिससे व्यक्ति निर्भीक और उसके अंदर वीरता की भावना उत्पन्न होने लगती है. इसके साथ ही उसके मन में आनंद का भाव भी उत्पन्न हो जाता है. किन्तु आप इस बात का ध्यान रखें कि जब भी आप अपने मूलाधार चक्र को जागृत करने के बारे में विचार करें तो आप एक संकल्प के साथ और पूर्ण जागरूकता के साथ ही इसकी शुरुआत करें. · मूलाधार चकएक का बीज तो “ लं ” है परंतु इस से पहले अपने आधार को मजबूत बनाने के लिए सहायक देवी देवताओं को ज्रागत करना जरूरी है जो भक्तों को सुरक्षित मुलाधार चक्र साधना एवं कुंडलीनी जागरण मे सफलता की प्रथम सीढ़ी है। १- गणेश २- चामुंडा ३- शिव सब से पहले इन्हें सिद्ध करने के लिए सहायक , ३ यंत्रों माला द्वारा मंत्र साधना करे। इसके साथ आप के अंदर रोशनी ओर शक्ति द्वारा देखने की ऊर्जा शक्ति उत्पन्न होने लगे गी , जो कुंडलीनी के अंदर ढूंढने में सहायक होती है। अगर आप कुंडलीनी ओर मुलाधार चक्र को अगर देख नही पा रहे हो तो जागरण केसे करो गे। इसलिए आप को सीढ़ी दर सीढ़ी आगे चढ़ते जाना है। आसान ओर सेफ रास्ता यही है जो शिव द्वारा संचालित एवं निर्देशित किया है।

कुंडलीनी चक्र

1- मुलाधार चक्र

2- स्वाधिष्ठान चक्र

3- मनीपुर चक्र

4 अनाहत चक्र

5- विशुद्धाय चक्र

6- आज्ञा चक्र

7- सहस्रार चक्र

8- बिन्दु चक्र

कुंडलीनी शिव धर्म

जीवन को सार्थक बनाने के लिए , चार मुख्य

पुरुषार्थों - धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष- ही हैं।

इन चार स्तम्भों पर ही आत्मा बीज रूप में (मुलाधार ) पर टिकी होती है।

प्रथम है धर्म - विजय भाव ऊर्जा , की विजय केवल अन्त मे सत्य की ही होती है। शिव धर्म द्वारा ही बाकी स्तम्भों को ऊर्जा प्राप्त होती है। इस स्तम्भ बीज रूप को ऊर्जा शिव लिंग द्वारा प्राप्त होती रहती है। यहीं से मोक्ष कुंडलीनी जागरण ओर सम्पूर्ण विश्व की सिद्धीयों , एवं जीवन आत्मा का विकास आर्थिक विकास का पहला द्वार खुलता है।

दुसरा है अर्थ - यानी की धन, लक्ष्मी सुविधा वगैरह जो शिव धर्म की ऊर्जा से पुरुषार्थ शक्ति द्वारा प्राप्त होता है। यही से शनि भी दन्ड देता है। शनि का कार्य स्थल ब्राह्म चक्र मे भी है। वह सूर्य स्थल से भी दन्डीत करता है।

तीसरा- काम यह शक्ति धर्म स्थान से बहुत ज्यादा प्रभावित होता है , अधर्म कार्य करने से यहां पर आत्मा का स्तम्भ कमजोर होने लगता है। जीवन काल मे जो हम कार्य करते हैं वह यही से बनने या बिगडते हैं।

४ - मोक्ष - इन तीन स्तम्भो का आधार ही मोक्ष होता है। यह स्तम्भ महा काली , गणेश की ऊर्जा का स्रोत हैं। काली यही से पुरी संसार की आत्माओ की जननी है।

प्रथम तीन पुरुषार्थ साधनरूप से तथा अंतिम साध्यरूप से व्यवस्थित था। मोक्ष परम पुरुषार्थ, अर्थात्‌ जीवन का अंतिम लक्ष्य था, किंतु वह अकस्मात्‌ अथवा कल्पनामात्र से नहीं प्राप्त हो सकता है। उसके लिए साधना द्वारा क्रमश: जीवन का विकास और परिपक्वता की आवश्यक होती है।

इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए भारतीय समाजशास्त्रियों ने आश्रम संस्था की व्यवस्था की गई थी। आश्रम वास्तव में जीव का शिक्षणालय अथवा विद्यालय है। ब्रह्मचर्य आश्रम में धर्म का एकांत पालन होता है। ब्रह्मचारी पुष्टशरीर, बलिष्ठबुद्धि, शांतमन, शील, श्रद्धा और विनय के साथ युगों से उपार्जित ज्ञान, शास्त्र, विद्या तथा अनुभव को प्राप्त करता है। सुविनीत और पवित्रात्मा ही मोक्षमार्ग का पथिक्‌ हो सकता है। गार्हस्थ्य में धर्म पूर्वक अर्थ का उपार्जन तथा काम का सेवन होता है। संसार में अर्थ तथा काम के अर्जन और उपभोग के अनुभव के पश्चात्‌ ही त्याग और संन्यास की भूमिका प्रस्तुत होती है। संयमपूर्वक ग्रहण से, त्याग होता है। वानप्रस्थ तैयार होती है। संन्यास के सभी बंधनों को को शिव धर्म की ऊर्जा द्वारा काट कर , पूर्णत: मोक्षधर्म का पालन होता है। इस प्रकार आश्रम संस्था में जीवन का पूर्ण उदार, किंतु संयमित नियोजन भी हैं।

कुन्डलिनी शक्ति इसी चक्र मे साढ़े तीन फेरे लगा कर सुप्त अवस्था मे रहती है।

उस की प्राकृतिक अवस्था तो जागृत रहना है परन्तु पाप ग्रस्त होकर वह सुप्त हो जाती है। इसे जाग्रत कर गंगा नाडी से ऊपर चढ़ाना कर शिव मे लीन करना ही मोक्ष होता है। GULERIA SADH GURU

मंत्र विज्ञान

मंत्र- म - मनन करने से जो त्र - त्राण करता हैं , रक्षा करता हैं उसे ही मंत्र कहते हैं.मंत्र शब्दात्मक होते हैं. मंत्र सात्त्विक, शुद्ध और आलोकिक होते हैं. अंत-आवरण हटाकर बुद्धि और मन को निर्मल करतें हैं.मन्त्रों द्वारा शक्ति का संचार होता हैं और उर्जा उत्पन्न होती हैं। आधुनिक विज्ञान भी मंत्रों की शक्ति को अनेक प्रयोगों से सिद्ध कर चुका हैं। मंत्र ऊं जो शिव मुख सहस्रार चक्र द्वारा उत्पन्न हुआ है सभी मँत्रों का आधार है। सभी मंत्रो के रचना शिव द्वारा ही हुई है।

मन्त्रों की प्रकृति:

मंत्र का सीधा सम्बन्ध ध्वनि से है इसलिए इसे ध्वनि -विज्ञान भी कहतें हैं. ध्वनि प्रकाश,ताप, अणु-शक्ति, विधुत -शक्ति की भांति एक प्रत्यक्ष शक्ति है । विज्ञान का अर्थ हैं सिद्धांतों का गणितीय होना. मन्त्रों में अमुक अक्षरों का एक विशिष्ट क्रमबद्ध , लयबद्ध और वृत्तात्मक क्रम होता हैं. इसकी निश्चित नियमबद्धता और निश्चित अपेक्षित परिणाम ही इसे वैज्ञानिक बनातें है। मंत्र में प्रयुक्त प्रत्येक शब्द का एक निश्चित ,रूप,आकर,प्रारूप,शक्ति,गुणवत्ता और रंग होता हैं . मंत्र एक प्रकार की शक्ति हैं जिसकी तुलना हम गुरुत्वाकर्षण, चुम्बकीय-शक्ति और विद्युत -शक्ति से कर सकते हैं. प्रत्येक मंत्र की एक निश्चित उर्जा,फ्रिक्वेन्सि और वेवलेंथ होती हैं.

अधिष्ठाता – देव या शक्ति :

प्रत्येक मंत्र का कोई न कोई अधिष्ठाता – देव या शक्ति होती हैं. मंत्र में शक्ति उसी अधि- शक्ति से आती हैं.मंत्र सिद्धि होने पर साधक को उसी देवता या अधि-शक्ति का अनुदान मिलता हैं. किसी भी मंत्र का जब उच्चारण किया जाता हैं तो वो वह एक विशेष गति से पहले शरीर आत्मा चक्र आकाश – तत्व के परमाणुओं के बीच कम्पन पैदा करते हुए उसी मूल -शक्ति / देवता तक पहुंचतें हैं, जिससे वह मंत्र सम्बंधित होता हैं. उस दिव्य शक्ति से वर मिश्रित ऊर्जा लेकर आने वाली परावर्तित तरंगें अपने साथ उस अधि -शक्ति के दिव्य- गुणों की तरंगों को अपने साथ लेकर लौटती हैं और साधक के शरीर,मन और आत्मा में प्रविष्ट कर उसे लाभान्वित करतीं हैं.

मंत्रों की गति करने का माध्यम:

ध्वनि एक प्रकार का कम्पन है। प्रत्येक मंत्र का शब्द आकाश के सूक्ष्म परमाणुओं में कंपन पैदा करता हैं. ध्वनि तरंगें एक प्रकार की ऊर्जा ही होती हैं. इन तरगों को यात्रा करने के लिए एक माध्यम की आवश्कता पड़ती हैं जो ठोस,तरल या वायु रूप में हो सकती हैं. हमारे द्वारा बोले गये साधारण शब्द वायु माध्यम में गति करतें हैं और वायु के परमाणुओं के प्रतिरोध उत्पन्न करने के कारण इन ध्वनि तरंगों की गति और उर्जा बाधित होती हैं.मन्त्रों की स्थूल ध्वनि -तरंगें वायु में व्याप्त अत्यंत सूक्ष्म और अति संवेदनशील ईथर -तत्व में गति करती हैं. ईथर – माध्यम के परमाणु अत्यंत सूक्ष्म और संवेदनशील होतें हैं.इसमें गति करनें वाली ध्वनी तरंगें बिना अपनी शक्ति- खोये काफी दूर तक ब्राह्मडं में जा सकती हैं. लेकिन मंत्र की सूक्ष्म – शक्ति आकाश में स्थित और अधिक सूक्ष्म तत्व जिसे मानस-पदार्थ कहतें हैं में गति करतीं हैं.वायु और ईथर के कम्पन्नों की अपेक्षा मानस-पदार्थ के कम्पन्न कभी नष्ट नहीं होते हैं और इसमें किये गए कम्पन्न अखिल ब्रह्माण्ड की यात्रा कर अपने इष्ट -देव तक पहुँच ही जातें हैं. अतः प्रत्येक मंत्र की शब्द – ध्वनियाँ एक साथ वायु, ईथर और मानस-माध्यमों में गति करतीं हैं.

मन्त्रों की गति:

प्रत्येक मंत्र साधक और उस मंत्र के अधिष्ठाता – देव के मध्य एक अदृश्य सेतु का कार्य करता हैं. साधारण बोले गए शब्दों की ध्वनि – तरंगें वातावरण में प्रत्येक दिशा में फ़ैल कर सीधे चलतीं हैं. लेकिन मन्त्रों में प्रयुक्त शब्दों को क्रमबद्ध, लयबद्ध,वृताकार क्रम से उच्चारित करनें से एक विशेष प्रकार का गति – चक्र बन जाता हैं जो सीधा चलनें की अपेक्षा स्प्रिंग की भांति वृत्ताकार गति के अनुसार चलता हैं और अपने गंतव्य देव तक पहुँच जाता हैं. पुनः उन ध्वनियों की प्रतिध्वनियाँ उस देव की अलोकिकता , दिव्यता , तेज और प्रकाश -अणु लेकर साधक के पास लौट जाती हैं. इसका उदहारण हम प्रत्यावर्ती बाण के पथ से कर सकते हैं , जिसकी वृत्तात्मक यात्रा पुनः अपने स्त्रोत पर आ कर ही ख़तम होती हैं अतः मन्त्रों के रूप में जो भी तरंगें अपने मस्तिष्क से हम ब्रह्माण्ड में प्रक्षेपित करतें वे लौट कर हमारे पास ही आतीं हैं। इसलिए हमें सभी प्रकार की शुरुआत मे शिव तथा गणेश जी से करना चाहिए। शिव जी के आशीर्वाद के बाद एवं सद् गुरू आज्ञा से शुरू साधना मे नई ऊर्जा की ऊँचाई पर पहुँथा जाता है।

जब हम मंत्र का जाप करतें हैं तो ब्रह्माण्ड के मानस -माध्यम में एक विशिष्ट प्रकार की असाधारण तरंगें उठती हैं जो स्प्रिंगनुमा- पथ का अनुगमन करती हुई देवता तक पहुँचती हैं. और उसकी प्रतिध्वनी लौटतें समय देवता का दिव्यता,प्रकाश,तेज, ऊर्जा और अन्य आलोकिक गुणों से युक्त होती हैं और साधक को इन दिव्य – अणुओं से भर देतीं हैं. साधक शारीरिक,मानसिक और अध्यात्मिक रूप से लाभान्वित होता हैं.

मंत्र-सिद्धि:

जब मंत्र ,साधक के भ्रूमध्य या आज्ञा -चक्र में अग्नि – अक्षरों में लिखा दिखाई दे,या मंत्र चलता दिखाई दे तो मंत्र-सिद्ध हुआ समझाना चाहिए. जब बिना जाप किये साधक को लगे की मंत्र -जाप अनवरत उसके अन्दर स्वतः चल रहा हैं तो मंत्र की सिद्धि होनी अभिष्ट हैं.

साधक सदेव अपने इष्ट -देव शिव की उपस्थिति अनुभव करे और उनके दिव्य – गुणों से अपने को भरा समझे तो मंत्र-सिद्ध हुआ जाने. शुद्धता ,पवित्रता और चेतना का उर्ध्गमन का अनुभव करे,तो मंत्र-सिद्ध हुआ जानें .

मंत्र सिद्धि के पश्च्यात साधक की शारीरिक,मानसिक और अध्यात्मिक इच्छाओं की पूर्ति होनें लग जाती हैं. शिव धर्म Mantra Sadhana मंत्र साधना Next

KUNDALINI CHAKRA

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